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अपने व्यवहार से ही मिलता सवाल का जबाब

  एक दार्शनिक समस्याओं के अत्यंत सटीक समाधान बताते थे। एक बार उनके पास एक सेनापति पहुंचा और स्वर्ग-नरक के विषय में जानकारी चाही। दार्शनिक ने उसका पूर्ण परिचय पूछा तो उसने अपने वीरतापूर्ण कार्यों के बारे में सविस्तार बताया। उसकी बातें सुनकर दार्शनिक ने कहा - शक्ल सूरत से तो आप सेनापति नहीं भिखारी लगते हैं। मुझे विश्वास नहीं होता कि आप में हथियार उठाने की क्षमता भी होगी। दार्शनिक की अपमानजनक बातें सुनकर सेनापति को गुस्सा आ गया। उसने म्यान से तलवार निकाला ली। यह देखकर दार्शनिक ठहाका लगाते हुए बोले - अच्छा तो आप तलवार भी रखते हैं। यह शायद काठ की होगी। लोहे की होती तो अब तक आपके हाथ से छूटकर गिर गई होती। अब तो सेनापति आप से बाहर हो गया। उसकी आँखे क्रोध से लाल हो गई और वह दार्शनिक पर हमला करने को उद्यत हो गया। तभी दार्शनिक ने गंभीर होकर कहा - बस यही नरक है। क्रोध में उन्मत होकर आपने अपना विवेक खो दिया और मेरी हत्या करने को तत्पर हो गए। दार्शनिक की बात सुनकर सेनापति ने शांत होकर तलवार म्यान में वापस रख ली। तब दार्शनिक ने कहा - विवेक जाग्रत होने पर व्यक्ति को अपनी भूलों का अहसास होने लगता ...

कथा सुनने का पुण्य नहीं मिला

  एक सेठ ने संकल्प लिया की बारह वर्ष तक वह प्रतिदिन कथा सुनेंगे। उनकी कामना थी कि उनकी धन, संपदा बढ़ती रहे। ईश्वर के प्रति भक्ति भाव प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने यह मार्ग चुना। संकल्प लेने के बाद कथा सुनाने के लिए ब्राह्मण की खोज आरंभ हुई। सेठ जी चाहते थे कि अत्यल्प पारिश्रमिक पर कार्य हो जाए। इसलिए उन्होंने अनेक ब्राह्मणों का साक्षात्कार लिया। अंत में उन्हें एक जैसा सदाचारी धर्मनिष्ठा ब्राह्मण मिला, जिसने बारह वर्ष तक बहुत कम पारिश्रमिक पर कथा सुनाना स्वीकार कर लिया। ब्राह्मण तय समय पर प्रतिदिन आता और सेठ जी को कथा सुना जाता। बारह वर्ष होने ही वाले थे कि सेठ जी को अत्यंत जरूरी व्यापारिक कार्य से बाहर जाना पड़ा। जाने के पूर्व उन्होंने जब यह बात ब्राह्मण को बताई, तो वह बोला - आपके स्थान पर आपके पुत्र कथा सुन लेगा। यह धर्मनुसार ही है। सेठ जी ने शंका व्यक्त की - कथा सुनकर मेरा पुत्र वैरागी तो नहीं हो जायेगा ? ब्राह्मण ने कहा - इतने वर्षों तक कथा सुनने के बाद आप संन्यासी नहीं बने, तो दो-चार दिन में आपका पुत्र कैसे वैरागी बन जाएगा ? सेठ से कहा - मैं तो कथा इसलिए सुनता था कि धार्मिकता का...

कर्मों के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन

  एक महात्मा के शिष्यों में एक राजकुमार और एक किसान पुत्र भी शामिल थे। राजकुमार को राजपुत्र होने का अहंकार था, जबकि किसान का बेटा विनम्र और कर्मठ था। राजकुमार के पिता अर्थात वहां के राजा प्रतिवर्ष एक प्रतियोगिता का आयोजन करते थे, जिसमे प्रतिभागियों की बुद्धि का पैनापन और दृष्टि की विशालता परखी जाती थी। उसमें हिस्से लेने के लिए दूर-दूर से राजकुमार आते थे। अध्ययन पूरा होने पर राजकुमार ने किसान पुत्र को उक्त प्रतियोगिता में शामिल होने का न्यौता दिया, ताकि वहां बुलाकर उसका निरादर किया जाए। जब किसान पुत्र प्रतियोगिता स्थल पर पहुंचा तो राजकुमार व अन्य राजपुत्रों ने उसे अपने मध्य बैठने से इंकार कर दिया। अंततः किसान पुत्र अलग बैठा गया। राजा ने प्रश्न पूछा - यदि तुम्हारे समक्ष एक घायल शेर आ जाए तो तुम उसे छोड़कर भाग जाओगे या उसका उपचार करोगे ? सभी राजकुमारों का एक ही उत्तर था कि शेर एक हिंसक प्राणी है हम अपने प्राण संकट में डालकर उस शेर का उपचार नहीं करेंगे। किन्तु किसान पुत्र बोला - मैं शेर का उपचार करूंगा, क्योंकि उस समय घायल जीव को बचाना मेरा परम कर्तव्य होगा। मनुष्य होने के नाते यही मेरा...

कष्टों में तपकर बना खरा सोना

  दंडी स्वामी बहुत बड़े विद्वान थे। वे सत्य के आग्रही थे और अहंकार व पाखंडी से दूर रहते थे। उनका आश्रम मथुरा में था। उसने शिक्षा पाने दूर-दूर से लोग आते थे। उनके शिष्यों में दयानंद भी थे। सभी शिष्यों के मध्य आश्रम के कार्यों का स्पष्ट विभाजन था, किन्तु दयानंद से अधिक काम लिया जाता था। उन्हें भोजन भी कम दिया जाता, जिसमे मात्र गुड़ व भुने हुए चने होते थे। रात में पढ़ने के लिए प्रकाश की सुविधा भी उन्हें नहीं दी जाती थी। जबकि दूसरे शिष्यों को अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थी। स्वामी जी के शिष्य दयानंद के प्रति उनके इस व्यवहार से चकित थे और परस्पर बातचीत में इसकी निंदा भी करते थे, किन्तु दयानंद को गुरु की निंदा अच्छी नहीं लगती थी। वे अन्य शिष्यों को ऐसा करने से रोकते थे और सदैव खुश रहकर गुरु की आज्ञा का पालन करते थे। एक दिन एक शिष्य ने स्वामी जी से इसका कारण पूछा, तो वे मौन ही रहे। अगले दिन उन्होंने अपने शिष्यों के मध्य शास्त्रार्थ करने का निर्णय लिया। सभी शिष्यों को बुलाकर उन्हें बहस हेतु एक विषय दे दिया, उन्होंने सारे शिष्यों को एक तरफ और दयानंद को अकेले दूसरी तरफ बैठाया। शास्त्रार्थ ...

तानसेन का चूर हुआ अहंकार

  सम्राट अकबर कलाप्रेमी थे, उनके दरबार में कलाकारों को पर्याप्त सम्मान मिलता था। तानसेन जैसे महान संगीत कार अकबर के दरबार की शोभा थे। सम्राट अकबर तानसेन के संगीत को बहुत पसंद करते थे। तानसेन अपनी संगीत कला से सम्राट को खुश रखते थे। अकबर का चहेता संगीतकार होने के कारण तानसेन को थोड़ा अहंकार आ गया। उस समय कुछ संगीत साधक ऐसे थे, जिन्होंने अपनी संगीत साधना का लक्ष्य ईश्वर को बनाया था। वे लोग संगीत के माध्यम से ईश उपासना में लीन रहते थे इनमें अष्टछाप के कवि तथा वल्ल्भ संप्रदाय के आचार्य विठलनाथ भी थे। एक बार तानसेन की मुलाकात आचार्य विठलनाथ से हुई। आचार्य विठलनाथ को तानसेन से वार्तालाप के दौरान आभास हुआ की तानसेन के अंदर अहंकार की भावना है। आचार्य विठलनाथ के कहने पर तानसेन ने गायन प्रस्तुत किया। विठलनाथ ने तारीफ करते हुए तानसेन को एक हजार रुपए व दो कौड़ी ईनाम के रूप में दी। तानसेन ने कौड़ियाँ देने का कारण पूछा तो विठलनाथ बोले - आप मुगल दरबार के मुख्य गायक हैं। इसलिए एक हजार रुपए का इनाम आपकी हैसियत को ध्यान में रखकर दिया है और यह दो कौड़ी मेरी व्यक्तिगत दृष्टि में आपके गायन की कीमत है। तानस...

बुद्धिमानी से राजा का दिल जीता

  सदियों पहले की बात है। राजा सूर्यसेन प्रतापगढ़ का राजा था। राजा की इकलौती संतान उसकी पुत्री भानुमति थी। वह अत्यंत सुंदर थी। भानुमति के विवाह योग्य होने पर राजा को पुत्री के लिए एक योग्य वर की तलाश थी। राजा एक ऐसा बुद्धिमान वर खोजना चाहता था जो उसकी पुत्री से विवाह के पश्चात उसके राज्य को भी संभाल सके। राजा ने ऐलान किया कि जो कोई भी राजकुमारी से विवाह करना चाहता है वह संसार की सबसे मूलयवान वस्तु लेकर आए। अनेक राजकुमार कई मुलयमान वस्तुएं लेकर राजा के समक्ष उपस्थित होते रहते थे किन्तु राजा ने सबको नकार दिया। राजा को यकीन था कि एक दिन कोई न कोई योग्य युवक इस शर्त को जरूर पूरा करेगा। एक दिन उसी राजा के राज्य के एक गांव के किसान के पुत्र रघु को राजा के इस शर्त के बारे में पता लगा। रघु बहुत बुद्धिमान था। उसने विवेकपूर्ण तरिके से सोचा और फिर एक दिन तीन वस्तुएं लेकर राजा के दरबार में हाजिर हो गया। राजा से अनुमति पाकर वह बोला - मैं दुनिया की तीन सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तुएं लाया हूँ। मेरे हाथ में यह मिट्टी है जो हमें अन्न देती है, यह जल है जो अमूल्य है और इसके बिना जीवन संभव नहीं है तीसरी वस्त...

बुराई से निपटने का स्टिक उपाय

  एक संत के आश्रम में सैकड़ों गायें थी। गायों के दूध से जो भी धन आता उससे आश्रम का संचालन कार्य होता था। एक दिन एक शिष्य बोला - गुरु जी आश्रम के दूध में निरंतर पानी मिलाया जा रहा है। संत ने उसे रोकने का उपाय पूछा तो वह बोला - एक कर्मचारी रख लेते हैं, जो दूध की निगरानी करेगा। संत से स्वीकृति दे दी। अगले ही दिन कर्मचारी रख लिया गया। तीन दिन बाद व्ही शिष्य फिर आकर संत से बोला - इस कर्मचारी की नियुक्ति के बाद से तो दूध में और भी पानी मिल रहा है। संत ने कहा - एक और आदमी रख लो, जो पहले वाले पर नजर रखे। ऐसा ही किया गया। लेकिन दो दिन बाद तो आश्रम में हड़कंप मच गया। सभी शिष्य संत के पास आकर बोले - आज दूध में पानी तो था ही साथ ही एक मछली भी पाई गई। तब संत ने कहा - तुम मिलावट रोकने के लिए जितने अधिक निरीक्षक रखोगे, मिलावट उतनी ही अधिक होगी, क्योंकि पहले इस अनैतिक कार्य में कम कर्मचारियों का हिस्सा होता था तो कम पानी मिलता था। एक निरीक्षक रखने से उसके लाभ के मद्देनजर पानी की मात्रा और बढ़ गई। जब इतना पानी मिलाएंगे तो इसमें मछली नहीं तो क्या मक्खन मिलेगा ? शिष्यों ने संत से समाधान पूछा तो वे बोले ...

मन की दुर्बलता

  एक दिन कैलाश पर्वत पर शिव-पार्वती बैठे थे। दोनों के मध्य पृथ्वीलोक के विषय में बातचीत चल रही थी। दोनों ने पृथ्वी लोक भ्रमण करने का फैसला किया और फिर भ्रमण के लिए निकल पड़े। तभी एक नगर के ऊपर से गुजरते हुए मां पार्वती ने देखा कि एक वृद्ध दंपत्ति अपने पुत्र के साथ दयनीय हालत में भिक्षा मांग रहा है। पार्वती दुखी हो गई। वे शंकर जी से बोली - प्रभु! आपकी बनाई दुनिया में कैसे गरीब लोग हैं ? इनकी मदद कीजिए। शिव जी ने कहा - मैं इन्हें प्रसन्न नहीं कर सकता क्योंकि ये अपने मन की दुर्बलता व नकारात्मक सोच के कारण दुखी हैं। परन्तु पार्वती जी का आग्रह जारी रहा। आखिर शिव जी को प्रणाम किया। शिव जी ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। वृद्ध औरत बोली - देव आप मुझे 18 वर्ष की युवती बना दें। शिव जी ने तथास्तु कह दिया। यह देख वृद्ध चिढ़कर बोला - दुष्टा! मुझे पता था कि अपने आसक्तियुक्त आचरण के कारण मुझे इस अवस्था में तू छोड़कर जाएगी। शिव जी बोले - आप क्यों परेशान हो रहे हैं ? आप भी वरदान मांग लें। वृद्ध ने कहा - आप इसे सुअरी बना दें। भगवान शिव के तथास्तु कहते ही वह सुअरी बन गई। माँ की दशा देखकर पुत्र रोने लगा। ...

लालच करने की सजा

  किसी गांव में राम और श्याम नाम के दो कुबड़े साथ-साथ रहते थे। राम गरीब और श्याम अमीर था, किन्तु दोनों में अच्छी मित्रता थी। एक दिन राम ने श्याम से कहा - भाई मैं कब तक तुम्हारे ऊपर बोझ बनकर रहूंगा ? यह सुनकर श्याम ने कहा - तुम मेरे कामों में मेरा हाथ बांटने लगो। ताकि तुम्हारे मन में ग्लानि न रहे। अगले दिन से राम श्याम के कार्यों में सहयोग करने लगा। कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक रहा किन्तु धीरे-धीरे श्याम राम से अधिकाधिक काम करने लगा और उसे अपमानित भी करने लगा। उसके रूखे व्यवहार से दुखी हो राम ने उसका घर छोड़ दिया और जंगल की तरफ चल पड़ा। जंगल में राम की भेंट एक वृक्ष यक्ष से हुई। उसकी दुखभरी कहानी सुनकर यक्ष को उस पर दया आ गई। उसने राम के कूबड़ पर हाथ फिराया तो वह ठीक हो गया। फिर यक्ष ने उसे एक थैली देते हुए कहा - इसमें सोने की मुहरें हैं यदि तुम सदैव सदाचरण करोगे तो यह थैली कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगी। राम जब वापस गाँव लौटा, तो श्याम के मन में लोभ जाग्रत हुआ और वह भी जंगल पहुंच गया। यक्ष के पास जाकर अपना दुखड़ा रोने लगा। लेकिन यक्ष अपनी शक्ति शक्ति से श्याम के झूठ को समझ गया। श्याम का लालच द...

सुखी जीवन की राह

  एक राजा हमेशा तनाव में रहता था। एक दिन उनसे मिलने एक विचारक आया। उसने राजा से उसकी परेशानी पूछी तो वह बोला -मैं एक सफलतम राजा बनना चाहता हूँ, जिसे प्रजा का हर व्यक्ति पसंद करे। मैंने अब तक अनेक सफल राजाओं के विषय में पढ़ा और उनकी नीतियों का अनुसरण किया, किन्तु वैसी सफलता नहीं मिली। लाख प्रयासों के बावजूद मैं एक अच्छा राजा नहीं बन पा रहा हूँ। राजा की बात सुनकर विचारक ने कहा - जब भी कोई वयक्ति अपनी प्रकृति के विपरीत कोई काम करता है, तो यही होता है। राजा ने हैरानी जताते हुए कहा - मैंने अपनी प्रकृतिक के विपरीत क्या काम किया ? विचारक बोला - तुम्हें बाकी लोगों पर हुक्म चलाने का अधिकार प्रकृति से नहीं मिला है। तुम जब बाकी लोगों की तरह साधारण जीवन बिताओगे, तभी आनंद मिलेगा। जंगल में रहने वाले शेर की जान उसकी खाल की वजह से हमेशा खतरे में रहती है क्यूंकि वह बहुत कीमती होती है। इसी वजह से वह रात में शिकार पर निकलता है, इस भी से कि सुन्दर खाल के कारण उसे कोई मार ही न डाले। शेर तो अपनी खाल नहीं त्याग सकता है, किन्तु तुम अपनी सफलता के लिए स्वयं को राजा मानना छोड़ सकते हो। जब तक स्वयं को राजा मानत...

बालक ने फिर गलती न करने की ठानी

  एक बालक अभी पुरे दो साल का भी नहीं हुआ था की उसके पिता की मृत्यु हो गयी। ऐसी कठिन परिस्थिति में उसकी मां उसे लेकर अपने मायके में रहने लगी। सभी उसे नन्हा कहकर पुकारते थे। छोटे से कद का बालक शारीरिक रूप से दुर्बल था किन्तु मानसिक रूप से अत्यंत मेधावी। उसे जो कुछ भी कहा या सिखाया जाता वह बड़े मनोयोग से उसे ग्रहण करता था। धीरे-धीरे दिन बीतते गए और बालक छह वर्ष का हो गया। एक बार वह अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर किसी बाग़ में फूल तोड़ने पहुंचा। वह बालक और उसके सभी फल तोड़ने लगे। तभी माली आ गया। उस बालक के सभी मित्र भाग गए, लेकिन वह माली की पकड़ में आ गया। माली ने उसे डंडे से पीटना शुरू किया। नन्हा मार खाता रहा और फिर धीमी आवाज में माली से बोला - मेरे पिता इस दुनिया में नहीं हैं, इसलिए तुम मुझे इस तरह मार रहे हो ? बालक की बात सुनकर माली का हाथ रुक गया। माली शांत होकर बोला - बेटा, तुम्हारे पिता के न होने से तुम्हारी जिम्मेवारी और अधिक बढ़ जाती है कि तुम कोई गलत काम नहीं करो। यह सुनकर नन्हा बालक फूट-फूट कर रो पड़ा और फिर कभी गलत काम न करने का संकल्प लिया। यही नन्हा बालक बड़ा होकर लाल बहादुर शास्त...

अनोखे गहनों की मांग

  उन्नीसवीं शताब्दी का एक प्रसंग है। मेदिनीपुर जिले के वीर सिंह नामक गाँव में एक मां अपने पुत्र के साथ रहती थी। माँ का रहन-सहन अत्यंत सादा था और विचार अति उच्च। अपने पुत्र को वह सदा सुसंस्कारों की शिक्षा देती थी। पुत्र भी मां का आज्ञाकारी था। माँ बहुत संघर्ष कर पुत्र का पालन-पोषण कर रही थी। पुत्र अपनी माँ के कष्टों को देखता- समझता था और इसी वजह से उसके मन में यह भावना थी कि बड़ा होकर अपनी माँ को सभी प्रकार के सुख दूँ। एक दिन पुत्र ने माँ से कहा - मेरी बहुत इच्छा है कि तुम्हारे लिए कुछ गहने बनबाऊं, तुम्हारे पास एक भी गहना नहीं है। यह सुनकर माँ बोली - बेटा ! मुझे बहुत दिनों से तीन प्रकार के गहनों की इच्छा है। पुत्र ने पूछा - वे कौन से गहने हैं ? माँ ने उत्तर दिया - बेटा इस गांव में स्कूल नहीं है। तुम एक अच्छा स्कूल बनवाना। एक दवाखाना खुलवाना। गरीब और अनाथ बच्चों के रहने और भोजन की व्यवस्था करवाना। यही मेरे लिए गहनों के समान होने। मां की बात सुनकर पुत्र रो पड़ा। वह पुत्र था पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर और माँ थी भगवती देवी। वीर सिंह गाँव में इस पुत्र द्वारा स्थापित किया हुआ भगवती विद्याल...

धर्मग्रंथों से ग्रहण करें सदाचरण

  एक महात्मा बड़े ज्ञानी थे। वे प्रायः अपने शिष्यों को रामायण, महाभारत और गीता ग्रंथों की अच्छी बातें बताकर उन्हें आचरण में उतारने का आग्रह करते थे। प्रतिदिन संध्या को वे प्रवचन करते और श्रोताओं को इन धर्मग्रंथों की कथाएं व दृष्टान्त सुनाकर उनमें सदाचार जाग्रत करने का प्रयास करते थे। स्वयं महात्मा जी का आचरण भी तदनुकूल ही था। वे कंदमूल खाते, कभी किसी वस्तु की इच्छा न करते थे। धन संग्रह में उनकी कदापि रूचि नहीं थी। यदि कोई शिष्य अथवा श्रोता श्रद्धापूर्वक उन्हें कुछ भेंट करता तो वे तत्क्षण उसे किसी जरूरतमंद को दान कर देता। प्रवचन के पश्चात लोगों के प्रश्नों व जिज्ञासुओं का भी महात्मा जी समाधान करते। वे प्रायः रामायण आदि गंथों से शिक्षा ग्रहण करने की बात कहते थे। एक दिन किसी व्यक्ति ने उनसे प्रश्न किया - महात्मा जी! रामायण को सही मन जाए या गलत ? उन्होंने उत्तर दिया - वत्स! जब रामायण की रचना हुई थी, तब मैं नहीं था। राम जी वन में विचरण कर रहे थे तब भी मेरा आता-पता नहीं था। इसलिए मैं नहीं बता सकता कि रामायण सही है या गलत। मैं तो सिर्फ इतना बता सकता हूँ कि इसके अध्ययन एवं इससे मिलने वाली श...

पत्नी ने कराया पति को आत्म-बोध

  उपन्यासकार डा. क्रोनिन अत्यंत निर्धन थे। पुस्तकों की रॉयल्टी या तो प्रकाशक हड़प जाते अथवा क्रोनिन को उनके हक से कम दो क्रोनिन बहुत सीधे थे। प्रकाशकों से लड़ाई कर अपना हक लेना उन्हें नहीं आता था। अतः गरीबी में उनका जीवन बिट रहा था। इसी गरीबी में जैसे-तैसे उन्होंने चिकित्सा की पढ़ाई पूर्ण की और डॉक्टर बन गया जब वे चिकित्सा के क्षेत्र में आए तो कुछ लोगों ने उन्हें इसके जरिए पैसा कमाने का तरीका बताया। वे लोगों की बातों में आकर मरीज से मोटी फ़ीस वसूलने लगे। वे किसी भी निधर्न पर दया नहीं करता और पुर पूरा चिकित्सा खर्च लेते। यह देखकर क्रोनिन की पत्नी बहुत दुखी हुई। वे अत्यंत दयालु थी। पति की गरीबों के साथ यह निर्दय देख एक दिन वे बोली - हम गरीब ही ठीक थे। हम से कम दिल में दया तो थी। उस दया को खोकर तो हम कंगाल हो गए, अब मनुष्य ही नहीं रहे। पत्नी की मर्मस्पर्शी बात सुनकर डा. कोर्निन को आत्मा-बोध हुआ और उन्होंने अपनी पत्नी से कहा - तुम सच कह रही हो। व्यक्ति धन से नहीं, मन से धनी होता है। तुमने सही समय पर सही राह दिखाई अन्यथा हम अमानवीयता की गहरी खाई में गिर जाते तो कभी उठ ही नहीं पाते। कथा का न...

योग्य उम्मीदवार

  बौद्ध धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार हो चुका था। अनेक बौद्ध मठ स्थापित हो चुके थे। सभी मठों में योग्य आचार्य व कुलपित की नियुक्ति की जानी थी, ताकि वे बौद्ध धर्म के समुचित प्रसार में अपनी महती भूमिका निभा सकें। आचार्य व कुलपति की नियुक्ति में उनके ज्ञान और विवेक के अतिरिक्त उनकी परहित-रूचि को भी विशेष रूप से परखा जाता था, क्योंकि मठ सामूहिक हितों को प्रमुखता देते थे। एक बड़े बौद्ध मठ के लिए योग्य कुलपति की नियुक्ति उन दिनों चर्चा का विषय थी। उस बौद्ध मठ के आचार्य ज्ञान और विवेक के धनी मोदगल्यायन थे। कुलपति पद के लिए तीन उम्मीदवार थे और तीनों ही योग्य थे, किन्तु चुनाव तो एक का ही करना था। अतः तीनों की परीक्षा लेने के लिए तीनों को जंगल में भेजा गया। आचार्य मौदगल्यायन उनकी परीक्षा लेने के लिए पहले ही जंगल में पहुंच गए। उन्होंने मार्ग में कांटे बिछा दिए। संध्या होने तक तीनों उम्मीदवार भी वहां आ पहुंचे। मार्ग में कांटे देखकर तीनों रुके। एक ने कुछ सोचकर अपना रास्ता बदल लिया। दूसरे ने कांटों पर से कूदकर रास्ता पार किया। तीसरा मार्ग से कांटे हटाने लगा, ताकि मार्ग दूसरों के लिए निष्कंटक बन जा...

गुरु ने बचाया शिष्य का जीवन

  एक गुरु और शिष्य तीर्थाटन हेतु जा रहे थे। चलते-चलते शाम घिर आई तो दोनों एक पेड़ के नीचे रात्रि विश्राम के लिए रुक गए। गुरूजी रात्रि में मात्र तीन चार घंटे ही सोते थे, इसलिए उनकी नींद जल्दी पूर्ण हो गई। वे शिष्य को जगाए बिना दैनिक कार्यों से निवृत हो पूजा-पाठ में लग गए। इसी बीच उन्होंने एक विषधर सर्प को अपने शिष्य की ओर जाते देखा। चूँकि गुरूजी पशु-पक्षियों की भाषा समझते थे, इसलिए उन्होंने सर्प से प्रश्न किया - सोए हुए मेरे शिष्य को डसने का प्रयोजन है ? सर्प ने उत्तर दिया - महात्म्न! आपके शिष्य ने पूर्वजन्म में मेरी हत्या की थी। मुझे उससे बदला लेना है। अकाल मृत्यु होने पर मुझे सर्प योनि मिली है। मैं आपके शिष्य को डसकर उसे भी अकाल मृत्यु दूंगा। क्षणभर विचार के उपरांत गुरूजी बोले - मेरा शिष्य अत्यंत सदाचारी व होनहार होने के साथ ही अच्छा साधक भी है, फिर तुम उसे मरकर विश्व को उसके ज्ञान और प्रतिभा से क्यों वंचित कर रहे हो ? स्वयं भी इस कार्य से मुक्ति नहीं मिलेगी। किन्तु सर्प का निश्चय नहीं बदला। तब गुरूजी ने एक प्रस्ताव को रखते हुए कहा - मेरे शिष्य की साधना अभी अधूरी है। उसे अभी इस क्ष...

जिज्ञासु को शब्द की महिमा समझाई

स्वामी विवेकानंद के प्रवचन ज्ञानयुक्त और तर्क आधारित होते थे। ज्ञान, भक्ति और कर्म विषयक जटिल से जटिल प्रश्नों का समाधान स्वामी जी अपनी सहज मेघा से कर देते थे। जिज्ञासुओं का जमावड़ा उनके आसपास हमेशा लगा रहता था। प्रवचन के दौरान या प्रवचन समाप्ति के उपरांत भी कई बार ऐसा होता था कि जिज्ञासुओं की ओर से प्रश्न आते रहते और स्वामी जी उन प्रश्नों का संतुष्टिजनक उत्तर देते। एक बार स्वामी जी अपने प्रवचन में भगवान के नाम की महत्ता बता रहे थे। यह सुनकर एक व्यक्ति ने तर्क दिया - शब्दों में क्या रखा है, स्वामी जी! उन्हें रटने से क्या लाभ होगा ? तब स्वामी जी उसे प्रमाण सहित समझाने के उद्देश्य से नीच जाहिल मूर्ख आदि अपशब्दों से संबोधित किया। यह सुनकर वह अत्यंत क्रोधित हो गया और कहने लगा - आप जैसे संन्यासी के मुहं से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते। आपके इन कुवचनों से मुझ बहुत आघात पहुंचा है। तब स्वामी जी बोले - भाई! वे तो शब्द मात्र थे। आपने ही कहा कि शब्दों में क्या रखा है ? मैंने भी तो आपको मात्र शब्द ही कहे, कोई पत्थर तो नहीं मारे। स्वामी जी कि बात सुनकर उस व्यक्ति को अपने प्रश्न का जवाब मिल गया कि अपशब्द ...

एक बाप और बेटे की कहानी

*एक बाप और बेटे की कहानी,इस कहानी को पूरा पढ़िए और समझिए* एक बाप अदालत में दाखिल हुआ ताकि अपने बेटे की शिकायत कोर्ट में कर सके।  जज साहब ने पूछा, आपको अपने बेटे से क्या शिकायत है। बूढ़े बाप ने कहा, की मैं अपने बेटे से उसकी हैसियत के हिसाब से हर महीने का खर्च मांगना चाहता हू।  जज साहब ने कहा, वो तो आपका हक है। इसमें सुनवाई की क्या जरूरत है। आपके बेटे को हर महीने, खर्च देना चाहिए। बाप ने कहा की मेरे पास पैसों की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी हम हर महीना अपने बेटे से खर्चा लेना चाहते है वो चाहे कम का ही क्यों न हो। जज साहब आश्चर्यचकित होकर, बाप से कहने लगे, आप इतने मालदार हो तो आपको बेटे से क्यों पैसे की क्या आवश्यकता है।  बाप ने अपने बेटे का नाम और पता देते हुए, जज साहब से कहा, की आप मेरे बेटे को अदालत में बुलाएंगे तो आपको बहुत कुछ पता चल जाएगा। जब बेटा अदालत में आया तो जज साहब ने बेटे से कहा, कि आपके पिता जी, आपसे हर महीना खर्चा लेना चाहते हैं। चाहे वह भले कम क्यों न हो।  बेटा भी जज साहब की बात सुनकर आश्चर्यचकित हो गया कहने लगा। मेरे पिता जी बहुत अमीर हैं, उनके पास पै...